संत नदी की तरह चलायमान होते हैं : प्रणवपुरी

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संत नदी की तरह चलायमान होते हैं : प्रणवपुरी
झाँसी। सीपरी बाजार स्थित एपीजे अब्दुल कलाम पार्क में चल रही श्रीराम कथा के पंचम दिवस का प्रसंग सुनाते हुए श्रीधाम वृन्दावन से पधारे महामृत्युन्जय पीठाधीश्वर प्रणवपुरी जी महाराज ने कहा कि संत संसार में है, परंतु संत में संसार नहीं है। वे तो जल में कमल की भांति हैं। संचय से त्याग बड़ा होता है, इसलिये संचय करने वाले को गुलाम व त्याग करने वाले को स्वामी अथवा मालिक कहा जाता है। संत नदी की तरह चलायमान होते हैं, यदि नहीं बहती है तो उसका जल ज्यादा पवित्र होता है किंतु पानी का बहाव रूक जाये तो दूषित हो जाता है।
अपने श्रीमुख से मानस की ज्ञान गंगा बहाते हुए प्रणवपुरी महाराज ने कहा कि जीवन में यदि कुछ उपलब्धियां चाहिए तो हमें तय करना होगा। गलना होगा, ढलना होगा तभी कुछ बड़ा बन पायेंगे। परमात्मा ने भी मानव जीवन में यह संदेश दिया कि बिना तप के जीवन में कुछ हासिल नहीं हो सकता। भगवान श्रीराम की बाल लीलाओं का विस्तार से वर्णन करते हुए कथा व्यास ने कहा कि भगवान के बालरूप के दर्शन करने देवलोक से सभी देवतागण। सूर्यदेव के अडिग रहने के कारण चन्द्रमा उनके दर्शन नहीं कर पाया। कथा व्यास ने कहा कि जगत के प्रति व्यर्थ का मोह माया है। भगवान के जनेऊ एवं नामकरण संस्कार की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि बच्चों के नाम भगवान से मिलते-जुलते रखना चाहिए तथा माता-पिता को स्वयं नामकरण न कर बुजुर्गों एवं विद्धानों से नामकरण कराना चाहिए। जगत में जीवन के प्रेम को स्वार्थ बताते हुए वे कहते हैं कि समर्पण का नाम ही प्रेम है।
प्रारंभ में श्रीमती शशि-शिवाकांत अवस्थी, डा. चन्द्रकांत अवस्थी, अनिल भार्गव, बड़ागांव ब्लाक प्रमुख ैकैलाश नारायण यादव, नीरज तिवारी, शैलेन्द्र शास्त्री ने महाराज श्री का माल्यार्पण कर मानस पुराण की आरती उतारी। संचालन रामकिशुन निरंजन ने कि l